Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 55, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
व्युत्थितस्य भवत्येषा समाधिस्थस्य चानघ ।
ज्ञस्य केवलमज्ञस्य न भवत्येव बोधजा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे निष्पाप
श्रीरामचन्द्रजी, यह बोध से उत्पन्न दृष्टि पंचमादि भूमिकाओं में भी समाधिस्थ ज्ञानी को होती हे,
सप्तम भूमिका में तो व्युत्थित को भी अर्थात् जो समाधिस्थ नहीं है उसको भी होती है, केवल अज्ञ को
कभी नहीं होती है