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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

अकर्तृ कुर्वदप्येतच्चेतः प्रतनुवासनम् । दूरं गतमना जन्तुः कथासंश्रवणे यथा ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

व्यवहार निरत ओर अरण्यवासी दोनों ही समान कैसे हो सकते है ? व्यवहारी पुरुष को कर्तृत्वप्रयुक्त बन्धन क्यों नहीं होगा ? ऐसी यदि कोई शंका करे, तो उस पर कहते हैं। जैसे कान्ता आदि की कथा के श्रवण में अन्यत्र आसक्त मनवाला पुरुष कथा श्रवण करता हुआ भी राग आदि विकारों का उदय न होने से रागादिप्रयुक्त दोषों से बद्ध नहीं होता, वैसे ही वासनारहित यह मन व्यवहार करता हुआ भी अकर्ता ही है यानी कर्तृत्वप्रयुक्त दोषों से बद्ध नहीं होता