Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अकुर्वदपि कर्तेव चेतः प्रघनवासनम् ।
निस्पन्दाङ्गमपि स्वप्ने श्वभ्रपातस्थिताविव ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न
में निश्चल देहावयववाले सुषुप्त पुरुष का मन भी गर्तपात और उसमें निवास का कर्ता बनता है वैसे ही
प्रचुरवासनावाला चित्त कर्म न करता हुआ भी कर्ता के तुल्य होता है यानी कर्तृत्वप्रयुक्त दोषों से बद्ध
होता है