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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

चेतसा संपरित्यज्य सर्वभावात्मभावनाम् । यथा तिष्ठसि तिष्ठ त्वं तथा शैले गृहेऽथवा ॥ २१ ॥ गृहमेव गृहस्थानां सुसमाहितचेतसाम् । शान्ताहंकृतिदोषाणां विजनावनभूमयः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

सब पदार्थों में अहंताममताअध्यास का मन से त्यागकर अपनी अभिरुचि के अनुसार आप चाहे पर्वत पर समाधिस्थ होकर बैठिये अथवा घर में व्यवहाररत होकर बैठिये