Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तज्जाभ्यां सुखदुःखाभ्यामथ तस्याभ्यभूयत ।
स्वगतिर्वागुराबन्धैः श्लिष्टाङ्गस्येव पक्षिणः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्तर निग्रहानुग्रह-व्यवस्था से किये जानेवाले उन राजकार्यो से उत्पन्न सुख
ओर दुःखों के कारण उसकी पारमार्थिक गति ऐसे लुप्त हो गई जैसे कि फंदे में फँसे पक्षी की गति लुप्त
हो जाती है