Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
धनमस्मै प्रयच्छामि धनेनानन्दवाञ्जनः ।
भवत्यहमिवाशेषस्तदलं मेऽतिनिग्रहैः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्तव्य के संशय में प्रथम कोटि को दिखलाते हैं।
इसलिए इन दुःखीजनों को मैं धन दूँ, इनके ऊपर निग्रह करना व्यर्थ है जैसे धन मिलने पर मैं
आनन्दित होता हूँ, वैसे ही सम्पूर्ण मनुष्य धन से ही आनन्दित होते हैं