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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verses 2–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

उत्तरस्या दिशो मेदः कर्पूरपटल भुवः । संभूतं हसनं शार्वं शुक्लो वा चान्द्र आतपः ॥ २ ॥ हिमाद्रेः श्रृङ्गमस्तीह कैलासो नाम पर्वतः । शैलकुञ्जरनिर्मुक्तकलापस्येव नायकः ॥ ३ ॥ विष्णोः क्षीरोद इव स्वर्गः सुरपतेरिव । अब्जजस्येव नाभ्यब्जं गृहं यः शशिमौलिनः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

सुरघु के निवास देश को बतलाने के लिए उसके पास के हिमालय के शिखर का वर्णन करते है । यहाँ हिमालय की चोटी केलास नाम का पर्वत है, वह क्या है ? उत्तरदिशा का सार है, भूमि से निकले हुए कपूर का समूह है, शिवजी का कल्याणमय हास्य हे, विशुद्ध चन्द्रमा का तेजःपुंज है अथवा उत्तर दिशा का सार, शिवजी का हास्य ओर चन्द्रमा का प्रकाश ये सब पृथ्वी में आकर मानों एक कपूर का ढेर बन गये हे । पर्वतो मे श्रेष्ठ हिमालय के द्वारा धारण की गई शिखरो की परम्परारूप मोतियों की माला का सुमेरु मणि है अथवा यों कहिये कि वह शैलों में विहार करनेवाले हाथियों से निकले हुए मुक्ता समुदाय का नायक संग्रहक राशि है । भगवान्‌ विष्णु के क्षीर सागर की तरह सुरपति इन्द्र के स्वर्ग की तरह और ब्रह्मा के आशय विष्णु नाभिकमल की तरह वह शशिमौली पार्वती पति का तो घर अर्थात्‌ ससुर द्वारा निर्मित निवास स्थान है