Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
संचरन्शंकरो दिक्षु भृगुष्विन्दुमणिद्रवैः ।
निवर्तन्ते प्रवर्तन्ते यत्राजस्रं च निर्झराः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
उस शिखर पर जिन-
जिन दिशाओं मे भगवान् शंकर का विचरण होता है उन-उन दिशाओं में (मस्तक में धारित चन्द्रमा की
ज्योत्सना के सम्पर्कं से) चन्द्रकान्त मणि के द्रवों से प्रपात स्थानों में झरने बह रहे हैं और जिन दिशाओं
में उनका विचरण नहीं होता, उन दिशाओं में बहते हुए झरने भी रुक जाते हैं