Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 63, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
उपादेयस्य चाभावाद्धेयमप्यस्ति किं किल ।
प्रतियोगि व्यवच्छेद्यं विना हेयं किमुच्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उपादान करने योग्य वस्तु का अभाव होने
के कारण कुछ भी हेय यानी त्याज्य नहीं है, क्योंकि जिस वस्तु का ग्रहण कर लिया हो, उसका परित्याग
ही तो होना है, ऐसी स्थिति में अब आप बतलाइये कि त्याग के विरोध और त्याग से हट जानेवाले ग्रहण
के (उपादान के) बिना "यह हेय है" ऐसा कैसे कहा जा सकता है ? अर्थात् कभी नहीं कहा जा सकता