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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 63, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

तुच्छत्वात्सर्वभावानामतुच्छत्वाच्च कालतः । चिरं मम परिक्षीणे तुच्छातुच्छे मनःस्थिती ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि जो तुच्छ है, वह हेय ओर जो अतुच्छ है, वह उपादेय क्यो नहीं होगा ? तो इस पर कहते हैं। महाराज, देश और कालवश सभी पदार्थ तुच्छ और अतुच्छ हो जाते हैं, इसलिए दीर्घकाल से मेरी तुच्छ और अतुच्छ विषयक मानस स्थिति नष्ट हो चुकी है । इसी विषय में दृष्टान्त है सम्पूर्ण भूमण्डल का राजा मुक्त हो जाने पर एक छोटे से गाँव में भी, जो कि पहले तुच्छ था, सन्तुष्ट रहता है और पहले के विस्तृत राज्य को भी तुच्छ समझता है, अत: समयवश ही तुच्छत्व और अतुच्छत्व की बुद्धि होती है