Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 63, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
रागान्निन्दास्तुती लोके रागश्च परिवाञ्छितम् ।
वाञ्छिते च महोदारं वस्तु शोभनबुद्धिना ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक में निन्दा ओर स्तुति दोनों राग से होते हैं और राग इच्छा को
कहते हैं, जिसकी बुद्धि निर्मल है, ऐसा पुरुष अत्यंत उदार आत्मवस्तु की ही इच्छा करता है, क्योंकि
वहाँ स्तुति ओर निन्दा की प्रसक्ति ही नहीं है