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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 63, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

मांसास्थिदारुमृद्रत्नमये जगति जर्जरे । वाञ्छनीयविहीनेऽस्मिञ्शून्ये किमिव वाञ्छ्यते ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस मांस और अस्थिमय अध्यात्म जगत में तथा काष्ठ, मृत्तिका ओर शिलामय अधिभूतजगत्‌ में, जो कि जर्जर, वांछनीय तथा शून्यात्मक है, क्या चाहा जाय ? अर्थात्‌ कुछ भी नहीं