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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 63, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

वस्तुनाऽवस्तुनेवान्तरमृतेनेव सागरः । अपुनःप्रक्षयायेव परे तृप्तोऽसि सुन्दर ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भाग्यवान्‌, जैसे समुद्र फेन अन्दर में अवस्थित अमृत से तृप्त रहा करता है, वैसे ही जिसकी अपेक्षा संसार में दूसरी परमार्थ वस्तु है ही नहीं, ऐसी स्वात्मरूपी वस्तु से ही आप पुनः संसार प्राप्ति में अहेतुभूत अपनी महिमा में ही परितृप्त रहते हैं