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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

परिज्ञातमनोमोहो जगद्भावोद्भवात्मना । स्पृश्यते नैनसा साधो रजसेव नभस्तलम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

विज्ञाता पुरुष को भावी दुःखो के हेतु पापों का भी सम्बन्ध नहीं होता, यह कहते है । हे साधो, जैसे धूली आकाश तल को स्पर्श नहीं कर सकती, वैसे ही विचारपूर्वक मनोमोह का स्वरूप भली भाँति जान लेनेवाले पुरुष को पाप, जिनका स्वरूप जगत्‌ में मिथ्याभूत करतृत्वाभिमान से उत्पन्न हुआ है वे (पाप) स्पर्श नहीं कर सकते