Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
नरो मोहसमुत्तीर्णः सततं स्वात्मचिन्तया ।
अन्तःशीतलतामेति स्वामृतेनेव चन्द्रमाः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चन्द्रमा अपने अमृत से भीतर शीतलता को प्राप्त करता है, वैसे ही मोह का
अतिक्रमण कर लेनेवाला पुरुष निरन्तर आत्मचिन्तनरूपी अमृत से अपने भीतर शीतलता को प्राप्त
करताहे