Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
भोगैकशरणं दीनं न चित्तं ज्ञस्य विद्यते ।
नन्दने दुर्द्रुम इव ज्ञचित्तं हि महावपुः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे नन्दनवन में
विषैले काँटों से युक्त वृक्ष नहीं होते, वैसे ही ज्ञानी पुरुष का केवल विषयोपभोगो में शरण लेनेवाला
अतएव अत्यन्त दीनता से युक्त मन नहीं होता, क्योकि उसका चित्त बड़ा हे यानी क्षुद्र विषय सुखो की
अभिलाषा से वर्जित है