Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
उन्मूलिताश्रयालानो मनोमत्तमतङ्गजः ।
तृष्णाकरेणुकोन्निद्रो दूरं विपरिधावति ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जन्मो- जनम विवेक के विरोधियों की प्रबलता और विवेक के सहायर्को की दुर्बलता है, इसका
सविस्तार वर्णन करते हैं।
जिसने परमात्मा में बन्धन के हेतु विवेकरूपी आलान को उखाड़ फेंका है और जिसने तृष्णा
विषयरूपी हथिनी में कामासक्त होने के कारण निद्रा खो दी है, ऐसा मनरूपी मदोन्मत्त हाथी दूर-दूर
चारो ओर दौड़ता रहता हे