Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 67, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अज्ञस्यायं यथा दृष्टः संसारः सत्यतां गतः ।
न ज्ञस्यायं यथाभूतः संसारः सत्यतां गतः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तत्त्वज्ञ ओर अतत्त्वज्ञ दोनो में समानता ही रही, इस पर कहते है ।
अज्ञानी पुरुष जिस रूप से इस संसार को देखता है, इसको उस रूप से सत्य ही मान लेता हे ओर
ज्ञानी पुरुष जिस रूप से इस संसार को देखता है उसको उस रूप से सत्य नहीं मानता