Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 67, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अन्तःसङ्गविहीनास्तु यथा स्नेहा दृषज्जले ।
तथासक्तमनोवृत्तौ बाह्यभोगानुभूतयः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब ज्ञानी पुरुष को अपने प्रारब्ध के अनुसार होनेवाले भोगानुभव किस तरह के रहते हैं ? इस पर
कहते हैं।
जैसे पत्थर और जल के सम्बन्ध भीतर के अनुप्रवेश से वर्जित होते हैं, यानी जल के भीतर न
पत्थर का प्रवेश होता है और न पत्थर के भीतर जल का प्रवेश होता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को आसक्ति
वर्जित मानसिक वृत्तियों के होने पर जायमान बाह्य विषयों के अनुभव भीतरी संग से (अभिमान से)
रहित होते हैं