Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 67, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
स्थिता सर्वत्र संवित्तिः शुद्धा संवेद्यवर्जिता ।
द्वित्वोपलाञ्छिता त्वन्या दुःसंवित्तिर्न विद्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वश्लोक में जल और काठ का दृष्टान्त संसर्गाभाव के बोधन केलिए और यहाँ तादात्म्य के अभाव
के बोधन के लिए दिया गया है, इसलिए पुनरुक्ति नहीं समझनी चाहिए। शंका हो कि यदि सुख, दुःख
आदि के ज्ञान का निषेध करते हैं, तो उनके ज्ञान को छोड़कर इस संसार में दूसरे ज्ञान का अभाव होने
के कारण शून्यता ही प्रसक्त हो जायेगी ? तो इस आशंका पर कहते हैं।
वेद्य विषयों से रहित शुद्ध संवेदन ही सर्वत्र अवस्थित है, द्वैत से कलंकित दूसरी संवित् है ही नहीं,
क्योंकि द्वैत विषय का निरूपण ही नहीं हो सकता