Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 56
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हिन्दी अर्थ
अज्ञान और ज्ञान के साक्षी दोनों के बीच में रहनेवाला
साभास मन ही तत् तत् नाना-रूपता को प्राप्त होकर जीव, बुद्धि, मन, चित्त, अहंकार आदि अनेक
नामों से व्यवहृत होता है