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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verses 61–62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verses 61–62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 61,62

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे एक पत्ते के रस का विनाश होने पर भी वृक्षव्यापी रस का विनाश नहीं होता, किन्तु अन्य पत्ते में उसकी सत्ता रहती ही है, वैसे ही देह का विनाश होने पर भी देहव्यापी आत्माका विनाश नहीं होता, किन्तु यदि वह वासनायुक्त है, तो शरीरनाश के बाद वासना में स्थित रहता है एवं जैसे क्षीण हुआ पत्ते का रस सूर्य की किरणों में चला जाता है, वैसे ही यदि वह वासनाशून्य है, तो ब्रह्माकाश स्वभाव में स्थित रहता है