Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 73, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अहंकारदृगन्या तु तृतीया विद्यतेऽनघ ।
देहोऽहमिति तां विद्धि दुःखायैव न शान्तये ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी देह मे स्नेह आदि की अयोग्यता बतलाकर अव स्त्री आदि के शरीरो में भी स्नेह आदि की
अयोग्यता है, यह बतलाते हैं।
जिसका स्त्री नाम यह दूसरा अभिधेय (वाच्य) है, ऐसे तुच्छ भूतों के समूह में यानी स्त्री -शरीरात्मक
पाँच भूतो के पिण्ड में पुरुषों को ऐसी क्या विशेषता प्रतीत होती हे, जिससे कि उनकी अग्नि में पतगे की
नाई, विषयाग्नि मेँ व्यामोह और राग से दृश्यमान गिरने की चेष्टा युक्तिसंगत कही जाय