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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 70

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 70

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

भीतरी आसक्ति ही दोष की उत्पादक है, ऊपर ऊपर की बनावटी आसक्ति दोष की उत्पादक नहीं है, इस विषय में दृष्टान्त कहते हैं। जैसे सुवर्ण भीतर के कलंक से ही कलंकित कहा जाता है , ऊपरी पंक आदि के लेपनरूपी कलंक से कलंकित नहीं कहा जाता, वैसे ही प्राणी भावासक्ति से यानी भीतरी आसक्ति से ही समासक्त कहा जाता है, ऊपरी बनावटी आसक्ति से आसक्त नहीं कहा जाता