Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 76, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 44
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हिन्दी अर्थ
मुक्ति नित्य-प्राप्त आत्मस्वरूप है, इससे भी उसके विनाश की आशंका नहीं हो सकती । विस्मृत
गले के हार की नाई आत्मा का आत्म अनात्मा के केवल विवेक से ही लाभ हो जाता है, ऐसा कहते है।
हे राघव, चूँकि इस संसार मेँ आत्मस्वरूप मुक्ति की सदा ही प्राप्ति है, इसलिए आत्मा अनात्मा के
विवेक-विज्ञान की उपलब्धि होने पर करोड़ों मनुष्य विमुक्त हो चुके हैं