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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

यथा व्योम्नीक्षणस्पन्दात्पिच्छमौक्तिकमण्डलम् । दृश्यते सदिवासत्यं चित्तस्पन्दात्तथा जगत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र जिसकी समस्त एषणाएँ यानी विषयाभिलाषाएँ निकल गई है, ऐसा आत्मवान्‌ (तत्त्ववित्‌) पुरुष इस दृश्यमान अखिल जगत्‌ को सर्वत्र सुषुप्त की नाई यानी व्यवहार दृष्टि से सुषुप्त के समान तमःस्वरूपमात्र सदा देखता है ओर परमार्थ दृष्टि से बाधित की केवल अनुवृत्ति होने के कारण असत्‌ की नाई अनासक्तिपूवर्क देखता है