Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
चिरं कालं हृते कान्तव्योमसंवेदनान्मुने ।
अवासनान्मनोध्यानात्प्राणस्पन्दो निरुद्ध्यते ॥ ३१ ॥
श्रीराम उवाच ।
ब्रह्मन् जगति भूतानां हृदयं तत्किमुच्यते ।
इदं सर्वं महादर्शे यस्मिंस्तत्प्रतिबिम्बति ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ मुनि दया ओर दीनता का परिग्रह नहीं करता, न क्रूरता का आश्रय लेता है, न
लज्जा का अनुसन्धान (अनुभव) करता है ओर न निर्लज्जता का अनुभव करता है