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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । साधो जगति भूतानां हृदयं द्विविधं स्मृतम् । उपादेयं च हेयं च विभागोऽयं तयोः शृणु ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

वह कभी भी दीनतायुक्त स्वरूपवाला नहीं होता, कभी उद्धत स्वरूपवाला नहीं होता । ओर न कभी प्रमत्त न खिन्न न उद्विग्न और न हर्ष युक्त ही होता है ॥ ३ २॥ शरत्‌कालिक आकाश की नाई अत्यन्त निर्मल, विस्तृत इसके चित्त में उस प्रकार कोप आदि उत्पन्न नहीं होते, जिस प्रकार आकाश में धान के अंकुर उत्पन्न नहीं होते