Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथा शौक्ल्यहिमे राम तिलतैललवौ यथा ।
यथा कुसुमसौगन्ध्ये तथौष्ण्यदहनौ यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ पुरुष पहले चक्षु आदि से देखे गये ओर
पीछे हाथ आदि से परिगृहीत हुए भी अन्न, वस्त्र आदि वस्तुओं का बुद्धि से ग्रहण नहीं करता वह
अन्तर्मुख होने के कारण अत्यन्त उदार ओर समस्वरूप है