Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
तथा राघव संश्लिष्टौ चित्तस्पन्दौ तथैव हि ।
अभिन्नौ केवलं मिथ्या भेदः कल्पित एतयोः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी जो शान्त बुद्धि से सम्पन्न
विद्वान् है, वह अन्तरात्मा में लीन दृष्टि से यह जनता का व्यवहार असंग, उदासीन आत्मा की केवल
सन्निधि से प्रवृत्त होने के कारण काष्ठनिर्मित जड प्रतिमा के संचार के सदुश है, ऐसा जानकर हसता
रहता हे