Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 24
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
पूर्ति के अनन्तर पूर्ण कुम्भ की नाईं कुम्भक के अनन्त काल तक स्थित होने पर और अभ्यास से
प्राण का निश्चल स्तम्भन हो जाने पर प्राण वायु से स्पन्दन का निरोध हो जाता है। (रेचक, पूरक और
कुम्भक इन त्रिविध प्राणायामों के विषय में पतंजलि निर्मित योगशास्त्र में विस्तार से वर्णन किया गया है
"तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम:: (आसन के ऊपर विजय पा जाने पर श्वास
(बाह्य वायु का आयमन-भीतर प्रवेश), प्रश्वास (कौष्ठ्य वायु का नि:सारण), इन दोनों की गति का
विच्छेद ही प्राणायाम है यानी श्वास और प्रश्वास दोनों का अभाव ही प्राणायाम है, उसे करना चाहिए) ।
इस प्राणायाम के अवान्तर भेद भी हैं - “बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो
दीर्घसूक्ष्मः ।') जहाँ प्रश्वासपूर्वक गतिनिरोध होता है, वह बाह्य है यानी बाह्यवृत्ति रेचक है । जहाँ
श्वासपूर्वक गतिनिरोध होता है, वह आभ्यन्तर है यानी आभ्यन्तर वृत्ति पूरक है। जहाँ पर श्वास और
प्रश्वास दोनों का अभ्यासनिरपेक्ष एक बार के प्रयत्न से गतिनिरोध होता है, वह स्तम्भवृत्ति है यानी
कुम्भक हे । इस कुम्भक में जैसे तप्त पत्थर के ऊपर प्रक्षिप्त जल चारों ओर से संकुचित हो जाता है,
वैसे ही श्वास, प्रश्वास दोनों की भी गति एक साथ निरुद्ध होकर स्तम्भित हो जाती हे । ये तीनों
प्राणायाम देश परिदृष्ट हैँ यानी इनका बाहर तूललव के स्पन्द आदि से ओर आभ्यन्तर नाभि आदि के
स्पन्दन आदि से इतना देश विषय होता है, ऐसा निर्धारण किया गया हे । काल से परिदृष्ट हैं - यानी
क्षणो की इयत्ता के अवधारण से परिच्छिन्न हैं । संख्याओं से परिदृष्ट है यानी इतनी संख्यावाले श्वास-
प्रश्वास कालों तक पहला प्राणायाम, दूसरा प्राणायाम और तीसरा प्राणायाम, यों उद्बोधित हे । इसी
प्रकार मृदु, इसी प्रकार मध्य और इसी प्रकार तीव्र हँ । यह प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म है यानी दीर्घता
ओर सूक्ष्मता युक्त प्राणों से दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता हे । “अभ्यासात् स्तम्भिते प्राणे" इस वाक्य से यह
सूचित किया कि रेचकादि तीन प्रकारो से पृथक् चतुर्थ भी एक प्राणायाम का प्रकार हे । यह चतुर्थ प्रकार
महर्षि पतंजलि ने यों बतलाया है : बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेषी चतुर्थः । पूर्वोक्त रेचक, पूरक के ऊपर
विजय पा जाने से उनका आक्षेप करनेवाला यानी उन दोनों का अतिक्रमण कर स्वयं ही वर्तमान प्राण
गति के अभाव रूप चतुर्थ प्राणायाम है । प्राणायाम की प्रतिष्ठा का फल भी कहा गया है : ततः क्षीयते
प्रकाशावरणम् । धारणासु च योग्यता मनसः" (प्राणायाम के अभ्यास से योगियों का विवेकज्ञान को
आवृत करनेवाला कर्म क्षीण हो जाता है, प्राणायाम के अभ्यास से धारणा में मन की योग्यता होती है) ।
इन सूत्रों के भाष्य मे लिखा है : तपो न परमं प्राणायामात्ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्च ज्ञानस्य । (प्राणायाम
से बढ़कर तप नहीं है, प्राणायाम से मल शुद्ध हो जाते हैं ओर ज्ञान की दीप्ति होती है)