Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 25
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जिह्नामूल के ऊपरी हिस्से में विद्यमान मुखान्तर्गत जो दो भाग है, उन्हें तालू कहते हैँ । उन दो
तालुओं के मध्यभाग में रहनेवाली घंटिका को (मुख वाने पर जिह्ना के मूलभाग में स्तन की नाई लटक
रही दृश्यमान इन्द्रयोनि को) प्रयत्न विशेष के द्वारा यानी वर्धनाभ्यास आदि यत्नं से भीतर प्राण के
संचरण मार्गभूत मूर्घरन्ध्र में प्रवेशित जिह्वा से नीचे की ओर करने से जब प्राण ऊर्ध्वरन्ध्र में (ब्रह्मरन्ध्र
में अर्थात् कपालकुहर में जो सुषुम्ना के ऊपरी भाग का द्वार कहा जाता है) प्रविष्ट हो जाता है, तब
प्राणवायु की चंचलता निरुद्ध हो जाती है । इसका प्रकार विशेष भगवान् स्कन्द ने इन शब्दों से प्रकाशित
किया है :
रसनां तालुविवरे निधायोर्ध्वमुखोऽमृतम् । धयन्निर्जरतां गच्छेदाषण्मासान्न संशय: ॥
ऊरध्वजिह्न: स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः । मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥
आकाशं च मरीचिवारिसदुशं यद्रह्मरन््रस्थितं यन्नाथेन सदाशिवेन सहितं शान्तं हकाराक्षरम्।
प्राणं तत्र विलीय पंचघटिकं चित्तान्वितं धारयेदेषा मोक्षकवाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ॥
(तालु मे जिह्वा को धारण कर ऊर्ध्वमुख योगी अमृत पी रहा छ: महीनों के भीतर युवा बन
जाता हे । जिह्ना को ऊँची करके स्थिर हो कर जो सोमपान करता है, वह आधे ही मास में मृत्यु के ऊपर
विजय पा जाता है, इसमें संशय नहीं करना चाहिए । मरीचिवारि के सदृश, ब्रह्मरन्ध्र मेँ अवस्थित,
शान्त, हकार अक्षरवाला स्वामी सदाशिव से समन्वित जो आकाश है, उसमें पाँच घड़ी पर्यन्तप्राण का
विलयकर चित्त को धारण करे, तो वह मोक्ष द्वार को खोलने में समर्थ नभोधारणा कही जाती है ।) मुख
को फैलाने पर गले के अन्दर लटक रहीं माँस का टुकड़ारूप जो घण्टी है, उसे इन्द्रयोनि कहते हैं, इसमें
श्रुति प्रमाण है : “अन्तरेण तालुके य एष स्तन इवालम्बते सेन्द्रयोनिः" (तालुओं के बीच में जो स्तन की
नाई लटकती है, वह इन्द्रयोनि है (इसीसे लम्बिका योग की भी सूचना होती है : जो "खेचरी" शब्द से भी
कही जाती है। कहा भी है :
कपालकुहरे जिह्व प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिमुद्रा भवति खेचरी ॥
(तालू के बीच मेँ कपाल कुहर नाम की एक गुफा है, उसी में जीभ को विपरीत भाव से पहुँचा कर
भ्रुयुगल के मध्य में अवलोकन करने से खेचरी मुद्रा होती है) इत्यादि योगशास्त्र मेँ सविस्तार निरूपित
है, यह लघुयोगवासिष्ठ की टीका के कर्ता का मत है