Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 27
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हिन्दी अर्थ
नासिका के अग्रभाग से उपलक्षित बारह अंगुलमात्र से परिमित बाह्य आकाश में चक्षु और मन का
निरोध होने से भी प्राणस्पन्दन निरुद्ध हो जाता है, यह कहते हैं।
नासिका के अग्रभाग में बारह अंगुलपर्यन्त यानी नासिका के अग्रभाग से लेकर बारह अंगुल परिमित
निर्मल आकाश भाग में नेत्रों की लक्ष्यभूत संविद्दुष्टि के (वृत्तिज्ञान के) विलीन हो जाने पर प्राण का
स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है