Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 28
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हिन्दी अर्थ
लम्बिकायोग से असमुच्चित अन्य उपायों से भी अभ्यस्त पूर्वोक्त नभोधारणा योग से प्राण स्पन्दन
रुक जाता है, ऐसा कहते हैं।
अभ्यास से यानी योगशास्त्र म दर्शित पवननिरोध के अभ्यास से ऊर्ध््वरन्ध्र के द्वारा (सुषुम्नामार्ग
से) तालू के ऊपर जो ब्रह्मरन्ध्र है, उसमें स्थित प्राणवायु जब गलितप्राय हो जाता है, तब प्राणवायु का
स्पन्दन रुक जाता है। ('तालूर्ध्वद्रादशान्तगे” इस प्रकार के लघुयोगवासिष्ठकार के पाठ के अनुसार
उक्त रीत्या प्राणवायु के तालू (विशुद्ध नाम का षोडशार चक्र), ऊर्ध्वं (ब्रह्मरन्ध्र) और द्वादशान्त
(अनाहत नामक द्वादशार चक्र) इनमें से किसी भी एक में चले जाने पर जब बहिर्मुख संवित् गलित हो
जाती है, तब प्राणवायु का स्पन्दन निरुद्ध हो जाता हे, यह अर्थ है)