Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 80, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अज्ञानसंक्षयात्क्षीणे मनसीमे पुनर्मिथः ।
रूपालोकमनस्काराः संघट्टन्ते न केचन ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल विचित्र तरगों से प्रस्फुरित होता है, वैसे ही द्वैत ओर अद्वैत
विकल्पों से समुद्भूत जन्म, मरण ओर विभ्रम स्वरूप आत्माओं से आत्मा ही अज्ञानियो के लिए प्रस्फुरित
होता है