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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

यदस्ति यच्च नास्तीह चित्ताद्यात्माद्यवस्तु च । तत्खादच्छतरं शान्तमनन्ताग्राह्यमाततम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

वास्तव में असम्बद्धं होने पर भी जो सम्बद्धत्व भ्रान्ति होती है, उसमें ज्ञान ही निमित्त है, ऐसा कहते हैं । हे चित्त, ये पूर्वोक्त रूपादि अज्ञानरूपी जंतु के (लाख के) द्वारा ही निरन्तर एक दूसरे से परस्पर सम्बद्ध हुए हैं, जब अज्ञानरूपी जंतु अज्ञान के ताप से पिघल जाता है, तब एक दूसरे से असम्बद्ध और बाधित होकर अधिष्ठान सन्मात्ररूप में अवस्थित रहते हैं