Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 25
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हिन्दी अर्थ
हे जगत्रूपी चित्तवेताल, शठरूप तुम पहले ही नहीं थे, वर्तमानकाल में भी नहीं हो ओर आगे भी
नहीं रहोगे, इस प्रकार तीनोंकालों में निषिद्ध किये गये भी तुम इस समय जो अपनी स्थिति बनाये रक्खे
हो, उसके लिए तुम्हें क्या लज्जा नहीं आती, आश्चर्य हे तुम्हारी निर्लज्जता का