Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 82, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
हे हे हतेन्द्रियगणाः किं मे बोधाय नेह वः ।
वेला विलुलिताम्बूनामब्धीमिव चञ्चलाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
किये गये विचार का उपसंहार कर रहे महाराज वस्रिष्ठजी उस की निरन्तर कर्तव्यता को कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, खाते, जाते, सोते ओर स्थित रहते सदा सर्वदा सर्वत्र उस प्रकार की प्रज्ञा से
युक्त चित्त से तत्त्वज्ञानी पुरुष प्रतिदिन भली प्रकार विचार करे