Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verses 52–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 52,53
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हिन्दी अर्थ
कहे गये दोनों कल्पो को फिर स्पष्ट कहते हैं।
हे चित्त, तुम यदि आत्मस्वरूप हो जाओगे, तो तत्स्वरूप ही रहोगे, क्योकि इस संसार में सर्वत्र
व्यापक केवल आत्मा का ही अस्तित्व है, उससे भिन्न दूसरे किसी का अस्तित्व नहीं है। यदि कहो कि
जड़ का अस्तित्व है, तो वह पृथक् तत्त्व ही नहीं है, परन्तु ब्रह्मरूप ही है। समस्त तीनों जगत् आत्मस्वरूप
ही हैं, आत्मा से भिन्न दूसरा कुछ भी नहीं हे । इसलिए यदि तुम आत्मा से पृथक् किसी वस्तु के रूप में
अपने को मानोगे, तो तुम कुछ भी नहीं हो यानी तुम परमार्थ रूप हो ही नहीं