Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पर्यन्तमण्डलाधीशमृगयानतबृंहितैः ।
पक्षिवानरनिर्ह्रादैर्मातङ्गास्फोटनिःस्वनैः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मनोरथो के तरंगरूपी सर्पो से वेष्टित, निहाररूपी यानी निबिड जडतारूपी इन्द्रियों के छिद्ररूपी
द्वारों से युक्त शरीर के कोटर में (हृदय में) जालनिर्माण में व्यग्र, चपल चिंतारूपी मकड़ी अपने भीतर
घूम रही है