Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्वल्पेनैव हि कालेन तस्मिन्पर्वतकन्दरे ।
प्रावृडोघविनुन्नेन पङ्केनोर्वीतले कृतः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अब चित्त और इन्द्रिययणों के न रहने पर समस्त गुणों की सम्पत्ति दिखलाते है ।
हे साधो चित्त, तुम्हारे विद्यमान न रहते सम्पूर्ण शुभश्रियाँ (आगे कही जानेवाली गुणरूपीश्रियाँ)
विवेकरूपी प्रकाश से युक्त उस प्रकार पूर्णरूप से विकसित होती है, जिस प्रकार प्रातःकाल में
कमलिनियाँ