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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अन्तरेव शशामास्य क्रमेण प्राणसंततिः । ज्वालाजालपरिस्पन्दो दग्धेन्धन इवानलः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे इन्द्रियवृन्द, आप लोगों की यह जो विचार दृष्टि से प्रसिद्ध आत्मसत्ता है यानी अपना अस्तित्व है, वह जीवनकाल मेँ अनर्थरूप दुःख का हेतु हे ओर उसके बाद फिर-फिर मृत्यु, नरक आदि को देनेवाला है, इसलिए पूर्व मे प्रदर्शित सद्विचार से आप लोग अपनी उक्त मिथ्याभूत सत्ता का परित्याग कर दीजिए