Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अनन्तर्निष्ठतां याते बाह्यार्थे चाप्यसंस्थिते ।
शेषेऽन्तर्लब्धसंस्थाने तस्यास्फुरितपक्ष्मणी ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे पूर्व मेँ किये गये आत्मतत्व के उपदेश से आप लोगों की यह
मिथ्याभूत सत्ता विनाश को प्राप्त ही हो गई, ऐसा मैं मानता हूँ, क्यों कि आप अज्ञान से उत्पन्न हुए हैं,
अतः उपदेश से अज्ञान का विनाश हो जाने पर सत्ता को प्राप्त नहीं कर सकेंगे