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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अशेषान्स ददर्शाथ नष्टानष्टान्स्वदेहकान् । अनष्टानां ततो मध्यात्तत्तत्कोटरसंस्थितम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

महामुनि वीतहव्य के, अर्धउन्मीलित नेत्रों का वर्णन करते हैं। महामुनि वीतहव्य के चंचलताशून्य दो नेत्र अत्यन्त अन्तर्निष्ठ निमीलित नहीं थे अर्थात्‌ आधे मूँदे हुए थे। (इससे उनके नेत्र बाह्य विषयों में लगे होंगे, यह भी नहीं) बाह्य विषयों में भी लगे नहीं थे, शेष यानी उन्मीलित अंश से अतिरिक्त अंशों से उनके नेत्रो ने भीतर स्थिति प्राप्त की थी यानी अन्तर्मुख- स्थिति प्राप्त की थी