Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यदृच्छयैव प्रोद्धर्तुं देहं तस्याभवन्मतिः ।
अपश्यत्तत्तथा तत्र पङ्के कीटमिव स्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि वीतहव्य के दोनों नेत्र ऐसे लक्षित होते थे मानों उनका स्वल्पसे भी
स्वल्प प्रकाश नासिका के अग्रभाग में दोनों ओर बराबर फैला हुआ है। इससे वे आधे विकसित पद्मों के
सदृश शोभा को प्राप्त कर रहे थे