Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
निमेषार्धार्धभागेन कालेन कलनां प्रभुः ।
जहौ चितश्चेत्यदशां स्पन्दशक्तिमिवानिलः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
विषयों के उपभोग से सामर्थ्य के व्यय से रहित, इन्द्रियों के स्वामी हे मन,
देखो कि शम से समन्वित तुमने किस प्रकार के समस्त जगत् को आनन्द देनेवाले व्यापक सुख को
अथवा निरतिशय आनन्दरूपी सुन्दर ब्रह्मरूप आकाश को प्राप्त किया है