Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 34
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अब ज्ञान के प्रादुभावि मेँ उपकारक देह की प्रार्थना कर उसको संबोधित करते है ।
संसार में सारहीन जीवनवाले हे मित्र देह, तुम्हारा कल्याण हो, क्योकि तुम्हारी ही कृपा से हम
अपने स्थान को जा रहे हैं । हे देह, यह अपने लोगों की वियोग की अवस्था आज की नहीं है, किन्तु
अनादि नियति का यही स्वभाव है, कारण कि जो संयोग होता है, उसका अन्त में वियोग में ही पर्यवसान
होता हे