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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

तस्मिंस्तथोपशान्ते हि परां निर्वृतिमागते । पयःकण इवाम्भोधौ स्वे पदे परिणामिनि ॥ २ ॥ तथैव तिष्ठन्निःस्पन्दः स कायो म्लानिमाययौ । अन्तर्विरसतां प्राप्य मार्गशीर्षान्तपद्मवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

"ओमित्येतदक्षरं सर्वम्‌” इत्यादि माण्डूक्य श्रुति में प्रदर्शित क्रम से अकार, उकार, मकार ओर अर्धमात्रा से कल्पित स्थूल, सूक्ष्म, अव्याकृत और तुरीयरूप पादं के भेद से ॐकार का स्मरण कर रहे महामुनि संन्यासी वीतहव्य पंचीकरण- प्रक्रिया में बतलाये गये विराट्‌, हिरण्यगर्भ और अव्याकृतरूप पादोका पहले तुर्य में "जागरितस्थानो" इत्यादि श्रुति प्रदर्शित रीति के अनुसार अध्यारोप ओर तदनन्तर "नान्तःप्रज्ञम्‌" इत्यादि श्रुति-प्रदर्शित रीति के अनुसार अपवाद कर तीन लोकों की रचना के लिए किये गये ब्रह्माजी के संकल्प से कल्पपर्यन्त कल्पित बाह्य ओर आभ्यन्तर विभाग से युक्त स्थूल, सूक्ष्म ओर कारण स्वरूप पदार्थो का भी परित्याग कर अविनाशी विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप का अपरोक्ष साक्षात्कार कर इन्द्रिय और तन्मात्राओं का परित्याग कर दिया