Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तस्य देहद्रुमान्तःस्थं त्यक्त्वा हृन्नीडमाययुः ।
प्रोड्डीय विहगायन्तो युन्त्रोन्मुक्ता इवासवः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार क्षोभशून्य चिन्तामणि अपने स्वरूप
में रहता हे, वैसे ही क्षोभशून्य आकारवाले महामुनि वीतहव्य अपने स्वरूप में ही स्थित थे, वे पूर्णचन्द्र
की नाई परिपूर्ण थे तथा मन्थनरहित मन्दराचल की नाई स्थिर विश्रान्ति से युक्त थे