Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 20
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हिन्दी अर्थ
आत्मा
के स्वरूप को भली प्रकार जाननेवाले आत्मवादियों के मत में जो आत्मतत्व है, सौत्रान्तिक ओर वैभाषिक
मत में प्रतिपादित स्थायित्व से अभासमान क्षणिक विज्ञानरूपी जो नैरात्म्यततत्व है, चित् ओर चित् के
बीच में शून्यात्मक तत्त्व है, जीवन्मुक्त महापुरुषों के मत में परिपूर्ण ब्रह्यात्मक जो तत्त्व है, तत्स्वरूप होकर
ही ये महामुनि अवस्थित थे । शून्यवादियों से उपक्रम कर सर्ववादियों से उपसंहार इसलिए किया गया
है कि उनकी परिच्छिन्नता ओर अपरिच्छिन्नता-वाद में परम अवधि है ओर अन्यान्य मध्यपतित मतों
में उभय का संमिश्रण है तथा तारतम्य से उनका उत्थान हुआ है, यह द्योतन हो